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आधुनिक संचार के दौर में भी कम नहीं हुई लोगों में रेडियो की दीवानगी

इंदौर : पत्रकारिता एवं जनसंचार अध्ययनशाला देवी अहिल्या विश्वविद्यालय में 13 फरवरी वर्ल्ड रेडियो दिवस के अवसर पर विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

वर्ल्ड रेडियो दिवस के अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम में विभाग के फैकल्टी सहित  विद्यार्थियों ने हिस्सा लिया,जिसमें रेडियो के इतिहास, उपयोगिता व उससे जुड़े विविध आयामों पर विशेषज्ञों के द्वारा बात रखी गई।

ऑल इंडिया रेडियो में लंबे समय तक सेवा दे चुके एक्स.स्टेशन डायरेक्टर बी.एन. बोस ने उपस्थित छात्रों को रेडियो व उसकी उपयोगिता से परिचित कराते हुए बताया कि जब हमें लता मंगेशकर, किशोर कुमार,मोहम्मद रफी,आशा भोसले के तरानों को महसूस करना हो,तो ये एहसास सिर्फ रेडियो को सुनकर ही मिल सकता है, लेकिन टीवी पर या दूसरी जगह यह सम्भव नहीं है, रेडियो पर हम और हमारी आवाज के अलावा अन्य  कोई नहीं होता है।
बी.एन. बोस ने रेडियो के इतिहास के सम्बंध में बताते हुए कहा कि अंग्रेजों के भारत आने से भारत में कई में बदलाव आया  जिससे भारत का विकास हुआ। अंग्रेज़ जब भारत आए तो वे संचार के लिए रेडियो और यातायात के लिए रेलगाड़ी लेकर आए, जिससे भारत के कई रियासतों का बिखराव इन पटरियों व तारों के जाल के माध्यम से आपस में जुड़ा।

23 जुलाई 1927 को वायसराय लॉर्ड डार्विन ने भारत में पहला रेडियो स्टेशन खोला। उसके बाद मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, दिल्ली व लखनऊ में रेडियो स्टेशनों की शुरुआत हुई।
रेडियो की प्रासंगिकता भारत में इतनी बड़ी की यहां के राजवाडों ने खुद के लिए रेडियो स्टेशनों बनवाये। जिसमें मैसूर के राजा ने 1930 में ‘आकाशवाणी’ नाम से खुद का रेडियो स्टेशन शुरू किया। जिसके नाम पर 3 अक्टूबर 1957 को इंदौर में आकाशवाणी विविध भारती के नाम से एक स्टेशन खोला गया जिसका लक्ष्य उस समय के प्रसिद्ध शिलांग रेडियो को टक्कर देना था।

*FM रेडियो से बढ़ी जागरूकता*

पत्रकारिता एवं जनसंचार अध्ययनशाला की विभागाध्यक्ष डॉ सोनाली नरगुदे ने रेडियो के बारे में बताते हुए कहा की रेडियो की प्रासंगिकता बहुत पुरानी है जो हमेशा से बनी रहेगी आज भी बहुत लोग ऐसे हैं जो  रेडियो को मनमुग्ध होकर लगन व जुनून से सुनते हैं।  बदलते समय के साथ आज रेडियो  एनालॉग से डिजिटल स्वरूप में बदल कर एफएम रेडियो बन गया है। जिसका जनसंचार के क्षेत्र में  विशेष योगदान है। रेडियो के कारण क्रिकेट, फिल्मी गानों, क्लासिकल म्यूजिक सहित कई अन्य विधाओं व उनसे जुड़े कलाकारों को प्रसिद्धि मिली है। आज रेडियो पूरे भारत में लगभग 98% भूभाग पर फैला हुआ है। जिसके कारण सूचना प्रसारण को काफी मजबूती मिली पाई है। हम उन स्थानों तक भी अपने सूचना व जानकारियों को भेजने में सक्षम हुए हैं जहां पर अन्य साधनों की पहुंच नहीं है।


आयोजित कार्यक्रम में डॉ. नीलमेघ चतुर्वेदी,डॉ. मनीष काले, प्रेमजीत सिंह, डॉ.अनुराधा शर्मा,नेहा रौनियार,राहुल महाशब्दे सहित विभाग के छात्र/छात्रा उपस्थित रहें।
कार्यक्रम का संचालन सौरभ मेश्राम के द्वारा किया गया एवं पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. सोनाली नरगुंदे ने  सभी अतिथियों का आभार व्यक्त किया।

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